गालीबाज (Abusive Person)
बचपन से हम गालियाँ सुनते आए।
फिर हम गाली देना सीख गए।
पहले यार-दोस्तों में देते थे,
अब तो गाली मुँह से
कहीं भी, कभी भी निकल जाए।
गाली कब मुँह से निकल जाए,
हमको भी समझ न आए।
कोई और हमें बताए,
तब हमें शर्म भी आए।
"गधा, कुत्ता, साला" से शुरुआत होती,
फिर कहाँ से कहाँ पहुँच जाए।
देने वाले को भी समझ न आए।
हमसे यहाँ लिखी भी न जाएँ।
हर बार हमने खुद से वादा किया,
हम गाली नहीं देंगे।
पर वादा ज़्यादा देर टिक न पाए।
गुरु को वचन भी दिया,
पर गाली निकलना बंद न हो पाए।
कहाँ बैठे हैं, किस बात पर कर रहे हैं,
कौन पास में बैठा है,
या फिर कोई महिला बैठी है—
हमसे खुद पर काबू न हो पाए।
कहीं फँस न जाएँ
किसी महिला के आरोप में,
कभी-कभी ऐसा डर भी सताए।
हम चाहते हैं, यह समस्या
हमारी संतान में बिल्कुल न जाए।
कोई हमें बताए,
अब कैसे छुटकारा पाया जाए?
शिशुपाल और कृष्ण का
101 गालियों का वृत्तांत
महाभारत में पाया जाए।
101 पर शिशुपाल मारा जाए।
अपने विभाग में महिला कर्मचारी रखो,
उसे संदेश भी देकर रखो।
जब गलती हो, ज़रूर टोका जाए,
तब यह समस्या धीरे-धीरे खत्म हो जाए।
बोलते-बोलते अचानक
गाली मुँह से निकल जाए।
जब आदमी की हालत ऐसी हो जाए,
तब उसे फिर "गालीबाज" ही कहा जाए।
घृणा नहीं, दया का पात्र बन जाए,
सहयोग से ही धीरे-धीरे सुधर पाए।
दिनांक 23 अगस्त 2025,©
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