Sunday, August 24, 2025

#H487 लौ

#H487
लौ

घना अंधेरा छाया।
कहीं दूर जुगनू-सा
क्या चमक रहा है?
पास पहुँच गया अब,
यह तो चिराग जल रहा है।

हवा से लड़ रहा है,
हिलते-डुलते जल रहा है।
मानो कह रहा हो हमसे—
हवाओं के झोंकों से
हार नहीं मानूँगा।
जो मेरा मकसद है,
जीवन को रोशनी देना,
अंतिम समय तक
रोशनी देता रहूँगा।
तेल खत्म होने तक
यों ही जलता रहूँगा।

घर का चिराग कह रहा है—
हार न मानो तुम,
जीवन के थपेड़ों से
निराश न होना तुम।

बलिदान सिखा रहा है,
देश पर जान देने की आहुति को
सदियों से आगे बढ़ा रहा है।

समाधि पर जलते हुए
न हार मानने की लौ जगा रहा है।
देश की सीमा पर
कोई चिराग जल रहा है,
तभी लोगों के घर में
चिराग जल रहा है।

दिनांक 19 अगस्त 2025,©
रेटिंग 9/10

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